कुषाण वंश पर इतिहासकार और समाजसेवियों से रूबरू

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 कुषाण वंश को लेकर काफी विवाद चल रहे हैं कोई कुछ बोल रहा हे तो कोई कुछ बोल रहा हे , लेकिन कुषाण भारतीय काल का वो स्वर्णिम युग थे जिसकी तुलना उनकी मुद्रा, वास्तु कला ,शिल्प कला , अभिलेख ,न्याय विवस्ता आदि की सूझ बुझ के निर्णायक फेसलो के इतिहास में आज भी निसान मौजूद हैं और कुषाण का  जम्बूदीप होना उतना ही खरा हे जितना आज उनके प्रतिनिधि कुषाण/कसाना/खटाना /बैसला /गॉर्सी हैं,,बैंसला (कुषाण सम्राट कुजुल कडफिस ने ‘बैंसिलिओ’ उपाधि धारण की थी  कनिष्क ने यूनानी उपाधि ‘बैसिलिअस बैंसिलोंन’ (Basilius Basileon) धारण की थी, जिसका अर्थ हैं राजाओ का राजा (King of King), कपासिया कुषाणों की राजधानी कपिशा (बेग्राम) कपसिया खाप के, गंगा जमुना के ऊपरी दोआब स्थित बुलंदशहर क्षेत्र में १२ गाँव हैं ‘’देवड़ा/दीवड़ा” कैम्पबेल ने भीनमाल नामक अपने लेख में देवड़ा को कुषाण सम्राट कनिष्क की देवपुत्र उपाधि से जोड़ा हैं 

इस विवाद को लेकर हमने इतिहास की किताबों को खोला जिसमे बेहद चौकाने वाले सच सामने आये जिनका जिक्र करना जरुरी हे जानिये वर्तमान इतिहासकारो ने क्या क्या लिखा हे 

 कनिंघम- सर कनिघम ने कुषाण को कसाना का वशंज तो बताया ही है अलेक्जेंडर कनिंघम ने आर्केलोजिकल सर्वे रिपोर्ट, खंड IV, 1864 में कुषाणों की पहचान आधुनिक गुर्जरों से की है| अपनी इस धारणा के पक्ष में कहते हैं कि आधुनिक गुर्जरों का कसाना गोत्र कुषाणों का प्रतिनिधि हैं| अलेक्जेंडर कनिंघम बात का महत्व इस बात से और बढ़ जाता है कि गुर्जरों का कसाना गोत्र क्षेत्र विस्तार एवं संख्याबल की दृष्टि से सबसे बड़ा है। कसाना गौत्र अफगानिस्तान से महाराष्ट्र तक फैला हुआ है| कसानो के सम्बंध में पूर्व में ही काफी कहा चुका हैं| तथा कनिंघम की बात को आगे बडाते हुऐ

डैनजिल इबैष्टोन-  अपनी बुक “कास्ट ओफ पंजाब” मै कहा है की कुषाण राजा इन्हीं गुर्जरो के राजा थे तथा मथुरा राजधानी  को  ब्रज का मध्यबिन्दू कहा गया है जिसके अनुसार दक्षिण तथा मध्यभारत तक  मै कुसानों की आबादी सभी  खांपों मे सबसे ज्यादा है, 

सुशील भाटी-जी ने आगे ऐक नई व्याख्या का आगमन किया जिससे ऐक नऐ श्रोत खुलते हैं’’ गुशुर>गुजुर>गुज्जर>गुर्ज्जर>गुर्जर’’ कुछ इतिहासकार के अनुसार गुर्जर शब्द की उत्पत्ति ‘गुशुर’ शब्द से हुई हैं| गुसुर ईरानी शब्द हैं|  ‘गुशुर’ शब्द का आशय राजपरिवार अथवा राजसी परिवार के सदस्य से हैं| बी. एन. मुख़र्जी के अनुसार कुषाण साम्राज्य के राजसी वर्ग के एक हिस्से को ‘गुशुर’ कहते थे | सबसे पहले पी. सी. बागची  ने गुर्जरों की ‘गुशुर’उत्पात्ति के सिद्धांत का प्रतिपादन किया था| प्रसिद्ध इतिहासकार आर. एस. शर्मा ने गुर्जरों की ‘गुशुर’उत्पात्ति मत का  समर्थन किया हैं |बम्बई गजेटियर भाग ६ जिल्द १प्रष्ट ४६१

एच.डब्लू.बेली – गुशुर’ शब्द का अर्थ ऊँचे परिवार में उत्पन्न व्यक्ति यानि कुलपुत्र हैं|  ‘गुशुर’ शब्द का आशय राजपरिवार अथवा राजसी परिवार के सदस्य से हैं| बी. एन. मुख़र्जी के अनुसार कुषाण साम्राज्य के राजसी वर्ग के एक हिस्से को ‘गुशुर’ कहते थे | सबसे पहले पी. सी. बागची  ने गुर्जरों की ‘गुशुर’उत्पात्ति के सिद्धांत का प्रतिपादन किया था| 

सर जेम्स केम्पबेल- कसाने कसाने-कुशन गुर्जरों के महत्वपूर्ण गोत्र के मानते हुऐ लिखते हैं ‘’The  Gurjar sub-division of kusane on the indus and Jamuana suggest a requriment from the great Saka tribe of Kusan before the White-huns horde the power of Kusanas had been broken by Samudra Gupt (AD396+15) existence of a Kusan sub-division of Gurjar (so far as it goes  )seems to favour  that the kusan and gurjar are difrent not the view’ 

श्री यतेन्द्र कुमार वर्मा -जी ने अपने ग्रन्थ मे यक कबूल किया है कि कुषान यूची गुर्जर थे जिसका सम्पूर्ण वर्णन (gurjar itihas p.166)मे किया है और कहा है की यह शुध्द आर्य तथा गुर्जर थे जिनके वर्णन भारत तथा मध्य एसिया मै विध्दमान हैं ’ 

अनिल कुमार पाल -वरिष्ठ समाज सेवी अनिल कुमार पाल जी ने भी एक बुक को लिखा हे जिसमे उन्होंने कुषाण को गुर्जर और भारतीय उप महादीप का बताया हे ,

छत्रपाल सिंह सिराधना -समाज सेवा कर अपनी पहचान बन चुके युवा व्यक्तित्व के धनी श्री छत्रपाल साहब जी के अनुसार “महाराज कनिष्क  की जयंती हर साल २२मार्च को गुर्जर समाज IGD -इंटरनेशनल गुर्जर डे के रूप में मनाता हे और मनाता रहेगा पूरा चम्बल ,और ग्वालियर का समाज इतिहास के साथ के साथ घिनोना काम करने बालों को  किसी कीमत पर माफ़ नहीं करेगा  महाराज कनिष्क हमारे पूर्वज हैं हम उनसे जुड़े हैं हमारे सब कुछ हैं हमारे बहुत से गोत्र उनसे निकले हैं किसी के कुछ भी कह देने से सच नहीं हो जाता हे “

नंदलाल गुर्जर -मशहूर पत्रकार श्री गुर्जर जी पथिक टुडे के सम्पादक  हैं और वर्षों से समाज सेवा करते आये हैं 

उनसे बात चित के दौरान उन्होंने बताया की भारतीय इतिहास में  सम्राट कनिष्क के योगदान को  लेकर जो संसय हे बो भारत के पूर्व प्रधानमंत्री स्वर्गीय श्री अटल बिहारी बाजपेयी जी मिटा चुके  हैं कुछ लोग डॉ कुमार विश्वास के बताये कनिष्क के विदेशी लुटेरे के व्याख्यान को तो बढ़ा चढ़ाकर फैलते हैं लेकिन ताल जी के वीडियो को क्यों नहीं फैलाते ??

कनिंघम- ने कसाना के साथ साथ ऐक और पहचान की तरफ इसारा करते हुऐ कहा है की कुषाणोँ के कुछ सिक्कों की तरफ इसारा करते हुऐ कहा है की “Korso” इस  को “गोर्सी” “Gorsi” सै पहचान करते हैं, चुंकी  यह गोत्र भारत तथा पाकिस्तान, अफगानिस्तान, मे बहुत अच्छी मात्रा मे है

आदि तमाम चर्चा परिचर्चा के बाद हमको जो सारांश निकल कर मिला वह यही हे की जिधर कुछ लोग इतिहास को मिटने के लिए भारत के एक महान सम्राट को मिटाने में लगे हैं वहीँ कुछ लोग उनके इतिहास को बचाने की कोसिस कर रहे हैं 

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