गुर्जर प्रतिहार वंश

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    गुर्जर प्रतिहार वंश या प्रतिहार वंश मध्यकाल में हर्षवर्धन की सत्ता के बाद आये उथल पुथल में  मध्य-उत्तर भारत के एक बड़े हिस्से में राज्य करने वाला राजवंश बन गया गुर्जर समाज , जिसकी स्थापना नागभट्ट नामक एक सामन्त ने  ई॰730  में की थी। इस राजवंश के लोग स्वयं  को राम के अनुज लक्ष्मण के वंशज मानते थे, जिसने अपने भाई  राम  को एक विशेष अवसर पर प्रतिहार की भाँति सेवा की। इस राजवंश की उत्पत्ति, प्राचीन कालीन ग्वालियर प्रशस्ति अभिलेख से ज्ञात होती है जबकि गुर्जर प्रतिहार कुषाण हूण का एक कबीला था जिन्होंने विपरीत समय में अपने मुख्य रूप को त्याग दिया और गुर्जर नाम से नयी सत्ता स्थापित की जिन्होंने कुषाण हूण की परम्परा रीती रिवाज पूजा अर्चना को अपनाया और आगे  लेकर आये आज भी गुर्जर समाज में कबीलों वाले गोत्र मिलते हैं जिसमे हूण ,कुषाण,खटाना ,गोरसी ,कपासिया ,मोटला,सोलंकी ,पंवार ,कामर, डोई ,बैसला आदि कबीलों के नाम से आज गोत्र बन कर स्थापित हो गए हैं 

    अपने स्वर्णकाल में प्रतिहार साम्राज्य पश्चिम में सतलुज नदी से उत्तर में हिमालय की तराई और पुर्व में बंगाल-असम से दक्षिण में सौराष्ट्र और नर्मदा नदी तक फैला हुआ था। सम्राट मिहिर भोज, इस राजवंश का सबसे प्रतापी और महान राजा थे। अरब लेखकों ने मिहिरभोज के काल को सम्पन्न काल बताते हैं। इतिहासकारों का मानना है कि प्रतिहार राजवंश ने भारत को अरब हमलों से लगभग 300  वर्षों तक बचाये रखा था, इसलिए प्रतिहार एक उपधि से इनको राष्ट्रकूट बुलाते थे (रक्षक) नाम पड़ा।

    प्रतिहारों ने उत्तर भारत में जो साम्राज्य बनाया, वह विस्तार में हर्षवर्धन के साम्राज्य से भी बड़ा और अधिक संगठित था। देश के राजनैतिक एकीकरण करके, शांति, समृद्धि और संस्कृति, साहित्य और कला आदि में वृद्धि तथा प्रगति का वातावरण तैयार करने का श्रेय प्रतिहारों को ही जाता हैं। प्रतिहारकालीन मंदिरो की विशेषता और मूर्तियों की कारीगरी से उस समय की प्रतिहार शैली की सम्पन्नता का बोध होता है।

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