मिहिर उत्सव और मिहिर भोज की आवश्यकता क्यों है

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राम प्रताप सिंह

गुर्जर समाज को जिस दूसरी वज़ह से याद किया जाता है वह है मिहिरउत्सव के लिये, मिहिर भोज के जन्म दिवस पर मनाया जाने वाली यह जयन्ती समस्त समाज के लिये, हिन्दू धर्म के लिये किसी एक विशेष त्यौहार से कम नहीं है,

“मिहिर” को सामान्य शब्दों मे तेजवान सूर्य के लिए उपयोग में लाया जाता है अर्थात जो जमीन से आद्रता सोख लेता है ठीक वैसे ही मिहिर अर्थात गुर्जर दुश्मनों की रगों का खून सामने आने से सोख जाता था यह अरब और गुर्जर राजवंश के संघर्ष के स्वरूप मे पहचान दिलायी थी,

गुर्जर शब्द की व्यख्या मे हर इतिहासकार का अलग अलग मत है गुर्जर एक सूर्य वंशी कुल है जो अग्नि और चंद्र की भी पूजा करता आया है

मिहिर भोज सम्राट ने 836 ईस्वीं से 889 ईस्वीं 54 तक साल तक राज किया। स्कंध पुराण के प्रभास खंड में सम्राट मिहिर भोज के जीवन के बारे में विवरण मिलता है। गुर्जर सम्राट मिहिर भोज का जन्म सम्राट रामभद्र की महारानी अप्पा देवी के द्वारा सूर्यदेव की उपासना के प्रतिफल के रूप में हुआ माना जाता है मिहिर भोज की पत्नी का नाम चंद्रभट्टारिका देवी मिहिरभोज गुर्जर राजवंश के सबसे महान राजा माने जाते है। इन्होने लगभग 55 साल तक राज्य किया था। इनका साम्राज्य अत्यन्त विशाल था और इसके अन्तर्गत वे थेत्र आते थे जो आधुनिक भारत के राज्यस्थान, मध्यप्रदेश, उत्तरप्रदेश, पंजाब, हरियांणा, उडीशा, गुजरात, हिमाचल,मुलतान, पश्चिम बंगाल और कश्मीर से कर्नाटक आदि राज्यों हैं।मिहिर भोज विष्णु भगवान के भक्त थे तथा कुछ सिक्कों मे इन्हे ‘आदिवराह’ भी माना गया है। मेहरोली नामक जगह इनके नाम पर रखी गयी थी। राष्टरीय राजमार्ग 24 का कुछ भाग गुर्जर सम्राट मिहिरभोज मार्ग नाम से जाना जाता है बिहार का भोजपुर इनके नाम से जाना जाता है मिहिर भोज को प्रभास, श्री मद आदिवराह, भोज, मिहिर नाम से जाना जाता है गुर्जर प्रतिहार राजाओं के द्वारा चलाये गए सिक्कों को उस काल में ग्रीक भासा के द्राम के नाम से जाना जाता था अभिलेखों में मिले जानकारी के अनूसार जिसमें कामा ,आहार, सियाडोनि के अभिलेखों के अनुसार गुर्जर प्रतिहार काल में मिहिर भोज के सिक्कों का नाम श्रीमदआदिवराह द्राम के नाम से जाना जाता था मिहिर भोज के समय सिक्कों की माप के अनुसार ग्रीक- सासानी सिक्के उस समय 66 ग्रेन तथा गुर्जर प्रतिहार कालीन सिक्के माप में 65 ग्रेन के थे जो काफी उत्तम दर्जे के थे

आम जनता से न्यूनतम कर की सुविधा लगाकर आम जनता और किसानो को सैनिक बना कर सेना में शामिल कर उनको वेतन दिया जाता था गुर्जर सम्राट मिहिर भोज की विशाल सेना-विश्व की सुगठित और विशालतम सेना भोज की थी-इसमें 8,00,000 से ज्यादा पैदल करीब 90,000 घुडसवार,, हजारों हाथी और हजारों रथ थे 36 लाख की कुल सेना जिसको चारो दिशाओं में चौकियों पे तैनात कर रखा था एक टुकड़ी पंजाब में तैनात थी जो कश्मीर और अफगानिस्थान की तरफ से होने बाले हमलों के लिए तैयार रहती थी ।दुसरीं टुकड़ी की संभवतः मांडू का गढ़ रहा था जिसको सेना की सरहद मान सकते हैं तीसरी सेना की टुकड़ी बिहार के भोजपुर तथा कन्नौज पर तैनात थी इसके अतिरिक्त अरब से होने बाले हमलों के लिए ऊंट तथा घोड़ों का उपयोग सम्राट की अगुवाई में किया जाता था सेना पर गुर्जर सम्राट राज्य की आय का 50% व्यय करते थे जिसकी बजह से राज्य की विशालता कायम थी 915 ईसवी में भारत आये बगदाद के इतिहासकार ने लिखा है क “गुर्जर राजा के पास 36 लाख सेना थी जो वर्तमान दुनिया की सबसे बड़ी सेना थी”गुर्जर सम्राट की सेना में किसान तथा अन्य सभी भाग लेते थे सागरताल के अभिलेख से मिहिर भोज ने “वाहिनिनापतीन” सब्द का उपुयोग किया जिससे साफ प्रदर्षित होता है कि सेना में एक से अधिक सेनापति ,सेनानायक होते थे इसने अभिलेखों में “तलक “बलाधिकृत का उल्लेख मिलता है मिहिर भोज की सेना चार भागों में विभाजित थी पैदल ,अस्व सेना ,गज सेना ,रथ सेना तथा अन्य सामन्तों की सेना थी बलाधिकृत तथा बलाध्यछ अर्थात सेनापति तथा सेना प्रमुख मुख्य सेना अधिकारी होते थे और सेना की कमान राजा के हात में होती थी गुप्तचर विवस्ता का अधिकारी दुतपेशनिक होता था ।।गुर्जर प्रतिहार साम्राज्य की राजधानी क्रमसः तीन भागों में विभक्त थी प्रथम मुख्य राजधानी ,उप राजधानी ,सांस्कृतिक राजधानी , जिनमे मुख्य राजधानी के तौर पर कन्नौज उज्जैन थी उप राजधानी के बतौर ग्वालियर ,भोजपुर ,मिहिरोली, पेहोवा ,तथा गुजरात मे थी इसके अतिरिक्त सांस्कृतिक राजधानी उज्जैन जो कि छीप्र नदी के किनारे और ओसिया तथा बटेस्वर थी चम्बल नदी के किनारे पर जिनके पास काले जादू के ख्याति प्राप्त जगह 64 योगनी मंदिर इनके समय की ही देंन है ,

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